पेंसिल कैसे बनाई जाती हैं? | How To Make Pencil in Hindi

पेंसिल कैसे बनाई जाती हैं, प्रकार, अविष्कार, बारे में, तथ्य, इतिहास (How To Make Pencil in Hindi, Making Process, business, History, Types, Facts)

पेंसिल, नाम सुनते ही बचपन याद आ जाता है. याद भी क्यों न हो हमारे बचपन का अहम हिस्सा जो रही है पेंसिल. हमारा पहला प्यार बोल लो या फिर दोस्त. हाथों से पकड़ा कर चलवाई जाती थी पेंसिल. आज हम पेंसिल की बजाय पेन का ज्यादा उपयोग करते है. बचपन में हमको पेंसिल से लिखना और पढना सिखाया जाता था क्यों कि पेंसिल का लिखा हुआ रबड़ की सहायता से मिटाया जा सकता है.

एक रिसर्च के अनुसार अगर बच्चे पेंसिल से ड्राइंग करते है तो ये उनके दिमाग की कसरत के लिए काफी जरुरी है. तो आज के इस लेखा में हम आपको पेंसिल का इतिहास, आविष्कार, पेंसिल कैसे बनाई जाती हैं? और पेंसिल से जुड़े तथ्य के बारे में बताएँगे.

पेंसिल का इतिहास (History Of Pencil In Hindi)

पेंसिल शब्द की उत्पति लेटिन भाषा के शब्द पेनिसिलिन (PENICILLUS) से हुई है. जिसका अर्थ होता है पूंछ. साल 1564 में जब इंग्लैंड में बहुत भयानक तूफान आया था. तूफान की वजह से पूरा जंगल उजड़ गया और बड़े-बड़े पेड़ जड़ से उखड गए थे. तूफान की वजह से पूरा जग जीवन अस्त व्यस्त हो गया था. फिर कुछ दिनों बाद वहा से भेड़ बकरियों को चराने के लिए चरवाहे का दल गुजरा उन्होंने देखा कि जो पेड़ जमीन पर पड़े थे उनकी जड़ो पर बहुत ताताद में काला सा दिखने वाला पदार्थ लगा हुआ था . उन्होंने सोचा शायद ये कोयला है. उन्होंने उस पदार्थ को कोयला समझकर जलाने की काफी कोशिश की लेकिन वो नही जला. वो समझ नही पा रहे थे आखिर ये पदार्थ क्या था. उन्होंने इसे काले पदार्थ का नाम दे दिया. और बकरियों के उपर निशान बनाने के लिए इस्तमाल में किया जाने लगा. बाद में इसका नाम ग्रेफाइट रखा गया.

ग्रेफाइट को कागज में लपेटकर इंग्लैंड के बाज़ार में भेजा जाने लगा. और फिर 16वीं शताब्दी में लोगो द्वारा ग्रेफाइट से लिखा जाने लगा. ग्रेफाइट का नरम और नाजुक होने की वजह से लोगो को लिखने में काफी परेशानी होती थी तो ग्रेफाइट के चारो और धागे से लपेटकर लिखना शुरू किया. साल 1560 में इटालियन लोगों ने एक तरकीब सोची उन्होंने जुनिपर नाम का एक पेड़ का इस्तेमाल करते हुए पेड़ की लकड़ी को काटकर और उनके छोटे छोटे टुकडो के अंदर होल करके ग्रेफाइट को इसके अंदर डाल दिया और चिपका दिया. और फिर साल 1660 में जर्मनी में लकड़ी के टुकड़ो को काटकर उसमे ग्रेफाइट डालकर चिपका दिया जाता था वहा पर इस तरह पेंसिल बनना शुरू हुआ.

साल 1790 में फ्रांस और इंग्लैंड के बीच युद्ध हो गया जिस वजह से फ़्रांस को इंग्लैंड ने ग्रेफाइट की सप्लाई देना बंद कर दिया. फ्रांस में ग्रेफाइट का प्रतिबंध लग जाने के बाद इसकी कमी हो गई. तब फ्रांस के मंत्री ने अपने कमांडर और वैज्ञानिक निकोलस-जैक्स कोंटे (Nicolas-Jacques Conté) को इसका कोई हल निकलने के लिए कहा गया. कुछ दिनों के प्रयोग के बाद निकोलस ग्रेफाइट और चिकनी मिट्टी को पानी में मिलाया और एक मिश्रण तैयार किया. उस मिश्रण को सूखने के लिए तेज़ धुप में रख दिया. सूखने के बाद तेज़ आग की भट्टी में पका दिया. और यही से वैज्ञानिक निकोलस ने देखा कि ग्रेफाइट में चिकनी मिट्टी को कम और ज्यादा करने पर पेंसिल की लिखावट में फर्क आ रहा था. और यही से H एवं HB जैसी आधुनिक पेंसिल का निर्माण हुआ. और साल 1795 में निकोलस-जैक्स को इस अविष्कार का पेटेंट मिला.

पेंसिल का अविष्कार तो हो गया लेकिन पेंसिल का लिखा हुआ मिटाने के लिए भी काफी प्रयास किये गए और 19वीं शताब्दी में रबड़ को पेंसिल के उपर लगाना शुरू किया था. उपर लगाने का कारण ये था कि लिखा हुआ जल्दी से मिटाया जा सके.

पेंसिल के प्रकार (Types Of Pencil)

पेंसिल का अधिकतर उपयोग नोट्स, ड्राफ्ट, आर्ट आदि बनाने में किया जाता है. बाज़ार में कई प्रकार की पेंसिल मिलती है. सभी पेंसिल के उपर अंग्रेजी में कुछ अल्फाबेट लिखे होते है और सभी का मतलब अलग-अलग होता है. अक्सर उपयोग में आने वाली पेंसिलें HB या F से चिह्नित होती हैं।

HB का मतलब?

H = हार्ड (कठोर)
B = बोल्ड (काला)

अधिक मात्रा में ग्रेफाइट वाली पेंसिलों को B, 2B, 3B, 4B, 5B, 6B, 7B, 8B, 12B आदि से चिह्नित किया जाता है। जबकि ज्यादा केओलिन (चीनी मिट्टी) वाली पेंसिलें H, 2H, 3H, 4H, 5H, 6H, 7H , 8H, 9H आदि हैं। B के पास संख्या जितनी अधिक होगी, ग्रेफाइट की मात्रा उतनी ही ज्यादा होगी। और इसके विपरीत, पेंसिल में जितना अधिक चीनी मिट्टी होगी, H चिन्ह के आगे उतनी ही अधिक संख्या होगी।

पेंसिल को उनके इस्तेमाल के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। एक ड्राइंग बनाने के लिए हार्ड पेंसिल (H) का इस्तेमाल किया जाता है, और सॉफ्ट पेंसिल (B) का उपयोग कलात्मक ड्राइंग में किया जाता है।

ग्रेडों के अनुसार पेंसिल (Pencils By Grades)

  1. कठोर (Hard) – 4H, 5H, 6H, 7H, 8H, 9H, 10H इन तरह की पेंसिल से हल्की ग्रे रंग की लाइन खिंची जाती है। हल्की व महीन लाइन को खींचने के लिए हार्ड ग्रेड की पेंसिलों इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह की पेंसिल टेक्निकल ड्राइंग, मैथमेटिकल ड्राइंग, ग्राफिकल, लिथोग्राफी और कार्टोग्राफी में किया जाता है.
  2. मध्यम (Medium) – इस श्रेणी में 3H, 2H, H, F, HB, और B आते है.
  3. सॉफ्ट (Soft) – इस श्रेणी में 2B, 3B, 4B, 5B, 6B, 7B, 8B, 9B आते है. इनसे काली लाइन बनती है। 9B पेंसिल से बनी लाइन बहुत ज्यादा काली और सॉफ्ट होगी.

पेंसिल कैसे बनाई जाती हैं (How To Make Pencil in Hindi)

पेंसिल बनाने के लिए सबसे पहले लीड की आवश्कता होती है. लीड बनाने के लिए जमीन के अंदर से ग्रेफाइट को निकाला जाता है. और बाद में ग्रेफाइट को पीस कर पाउडर के रूप में बना लिया जाता है. जिसके बाद एक बड़े मिक्सचर में पीसा हुआ ग्रेफाइट, चिकनी मिट्टी (Clay) और पानी को डालकर लगभग 25 मिनट तक अच्छे से मिक्स किया जाता है. अगर कलर पेंसिल बनानी होतो इन्ही के साथ जिस कलर की पेंसिल बनानी हो उसी तरह का कलर डाल दिया जाता है. इसके बाद ग्रेफाइट और क्ले के पेस्ट को एक हाइड्रोलिक प्रेस मशीन में डाल दिया जाता है. और हाइड्रोलिक प्रेस मशीन की मदद से इस पेस्ट की एक लम्बी लीड बनाकर तैयार हो जाती है. और बाद में इन लीड को लम्बाई के अनुसार काट दिया जाता है. इन लीड को एक मशीन के अंदर डालकर सुखाया जाता है, जिससे इसमें मौजूद नमी ख़त्म हो जाये. लेकिन अभी लीड नरम और नाजुक है. इन्हें कठोर बनाने के लिए एक इलेक्ट्रिक ओवन में 1500 डिग्री सेल्सियस पर 45 मिनट तक रखा जाता है. कलर वाली पेंसिल को बनाने की प्रक्रिया भी पहले जैसी ही है बस इसमें जिस तरह की पेंसिल बनानी हो वो कलर साथ में मिला दिया जाता है.

अगले प्रक्रिया में लीड को 6 घंटो के लिए मोम (wax) में रखा जाता है ताकि लीड में बची हुई जगह भर जाये और पेपर पर काफी स्मूथ चले. इनके बाद लीड का टेस्ट किया जाता है. टेस्ट में ये पता लग सके कि लीड कितना दबाव झेल सकती है. इन टेस्ट के बाद अन्य दो और टेस्ट किये जाते है.

अब बारी आती है लकड़ी की. पेंसिल बनाने के लिए एक खास तरह की लकड़ी की आवश्यकता पड़ती है. जो इतनी कोमल होती है कि आसानी से छील सके और इतनी कठोर हो कि लिखते समय टूटे ना. पेंसिल बनाने के लिए देवदार की लकड़ी (Cedar Wood) का उपयोग किया जाता है.

देवदार की लकड़ी को 0.2 इंच मोटाई, 7 इंच लम्बाई और 2.5 इंच चौडे आकर में काट कर फैक्ट्री में लाया जाता है. इन सभी लकड़ी को खांचे मिलिंग मशीन में डाल दिए जाते है. सबसे पहली प्रक्रिया में इन लकड़ी पर नाली के आकर के खांचे बनाये जाते है. खांचे बन जाने के बाद इन पर ग्लू लगाई जाती है. ग्लू लग जाने के बाद एक स्लेट के उपर दूसरी स्लेट रख कर कन्वेयर बेल्ट पर आगे भेज दिया जाता है. और आगे चलकर उपर वाली स्लेट को दुसरे कन्वेयर बेल्ट पर एक मशीन से खिसका दिया जाता है.

मशीन के अंदर एक-एक करके लीड नालीनुमा खांचे में फिट हो जाते है और जैसे-जैसे मशीन का खांचा लीड के साथ गोल-गोल धूमता है वैसे ही लीड लकड़ी पर बनी नालीनुमा खांचे में फिट हो जाता है. और जो स्लेट दुसरे कन्वेयर पर थी उन्हें वापस एक मशीन के अंदर से ग्लू लगाकर इन लीड वाले स्लेट के उपर रख दिया जाता है और एक प्रेशर मशीन इन बॉक्स को दबाकर रखती है ताकि दोनों स्लेट एक दुसरे से अच्छी तरह से चिपक जाये. इस प्रक्रिया को सैंडविच भी कहते है.

अब बारी आती है लकड़ी के स्लेट को पेंसिल के आकार की देने की. मशीन द्वारा पेंसिल को Hexagon Shape, Round Shape और Triangle Shape के अनुसार काट दिया जाता है. एक बार में मशीन 7 से 10 पेंसिल काट देती है. फिर किसी भी एक पेंसिल को निकालकर उसे छिला जाता है और साथ ही उसकी टिप पर दबाव डालकर उसका टेस्ट किया जाता है. एक उच्चतम गुणवत्ता वाली पेंसिल 2.5 किलो तक का दबाव सहन कर सकती है.

अब बारी आती है पेंसिल के उपर कलर लगाने की. इस प्रक्रिया में सभी पेंसिल को एक-एक कर के कलरिंग डिवाइस में डाल दिया जाता है जिसमे इन पेंसिल पर कलर की एक परत चढ़ जाती है. इसके बाद इन पेंसिल पर ट्रांसपेरेंस की एक परत चढाई जाती है ताकि पेंसिल के उपर लगा कलर हटे ना. इन सभी प्रक्रिया के बाद पेंसिल पर कम्पनी की सील लगाई जाती है.

रबड़ वाली पेंसिल के लिए इनके उपर वाले हिस्से को दबाया जाता है और फिर रबड़ लगाया जाता है. जिस पेंसिल में रबड़ नही लगाया जाता उनके उपर एक विशेष तरह के कलर में डाल दिया जाता है. इस तरह पेंसिल को बनाकर डब्बे में पैक कर बाज़ार में पहुंचाई जाती है.

पेंसिल के बारे रोचक तथ्य (Interesting Facts About Pencil)

  • एक पेड़ से लगभग 3 लाख से ज्यादा पेंसिल बनाई जा सकती है.
  • स्पेस में सिर्फ पेंसिल से ही कागज पर कुछ लिख सकते है.
  • पेंसिल से अगर 500 साल बाद भी लिखा जाये तो ये काम करेगी.
  • एक पेंसिल 50 हज़ार मीटर तक लिख सकती है.
  • पेंसिल शब्द की उत्पति लेटिन भाषा के शब्द PENICILLUS से हुई है. जिसका अर्थ होता है पूंछ.
  • जॉन स्टीनबेक ने अपनी उपन्यास को लिखने के लिए हर दिन 100 पेंसिल का इस्तमाल किया था.
  • दुनिया की सबसे लंबी पेंसिल 323.51 मीटर है, इसे ब्रिटेन के एडवर्ड डगलस मिलर ने बनाया है और इस पेंसिल का नाम को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया है.
  • हर वर्ष सम्पूर्ण विश्व में 14 अरब से ज्यादा पेंसिल बनाई जाती है.
  • वैज्ञानिक थॉमस ऐल्वा एडीसन हमेशा अपने पास पेंसिल रखा करते थे ताकि तब भी कोई आईडिया माइंड में आये फट से लिखा लिया करते थे.

दुनिया की सबसे महंगी पेंसिल (World’s Most Expensive Pencil)

दुनिया की सबसे महंगी पेंसिल का नाम है Perfect Pencil. जिसके निर्माता Faber-Castle है. इस का सिर्फ लिमिटेड एडिशन है. इसे 250 साल पुरानी जैतून की लकड़ी से बनाई जाती है. इस पेंसिल में शुद्ध 18 कैरेट सफेद सोने जड़े हुए है और इसके उपरी हिस्से पर 0.06 कैरेट हीरे की कोटिंग की मुहर होती है। इस पेंसिल की कीमत 9 लाख रूपये बताई जाती है.

 

FAQ

Q : पेंसिल कितने प्रकार के होते हैं?
Ans : पेंसिल कई प्रकार की होती है, जैसे- 4H, 5H, 6H, 7H, 8H, 9H, 10H , 3H, 2H, H, F, HB, B, 2B, 3B, 4B, 5B, 6B, 7B, 8B और 9B.

Q : पेंसिल में कौन सा तत्व होता है?
Ans : पेंसिल में ग्रेफाइट नमक तत्व होता है.

Q : पेंसिल के अंदर कौन सी रोड होती है?
Ans : पेंसिल के अंदर ग्रेफाइट की रोड होती है?

Q : पेंसिल का आविष्कार कौन किया था?
Ans : कॉनराड गेसनर, विलियम मुनरो, निकोलस-जैक्स कोंटे

Q : सबसे मुलायम पेंसिल कौन सी है?
Ans : सबसे मुलायम पेंसिल 4B पेंसिल है.

Q : सबसे हार्ड पेंसिल कौन सी है?
Ans : सबसे हार्ड पेंसिल 4H, 5H, 6H, 7H, 8H, 9H, 10H  है.

Q : सबसे अच्छी पेंसिल कौन सी है?
Ans : 3H, 2H, H, F, HB, और B

Q : पेंसिल का वजन कितना होता है?
Ans : पेंसिल के वजन कोई सीमा नही है उसकी बनावट के उपर वजन निर्भर है.

Q : सबसे डार्क पेंसिल कौन सी होती है?
Ans : 4H, 5H, 6H, 7H, 8H, 9H, 10H

Q : पेंसिल का हिंदी नाम क्या है?
Ans : पेंसिल

Q : पेंसिल को संस्कृत में क्या कहते हैं?
Ans : अंकनी

 

 

 

मेरा नाम अशोक जांगिड है. मैं जयपुर राजस्थान में रहता हूँ. मुझे कई सालो का ब्लॉग्गिंग का अनुभव है.

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