शीत युद्ध किसे कहते हैं, कारण एवं परिणाम | Cold War, Reason, Result In Hindi

शीत युद्ध किसे कहते हैं, कारण, परिणाम, कब हुआ, अंत, अर्थ, तात्पर्य, प्रभाव, भूमिका (Cold War In Hindi, Era, Result, Reason, Battle, cold war ke karan)

विश्व के इतिहास में शीत युद्ध उस युद्ध को कहा गया है, जब दो या दो से अधिक शक्तिशाली देशो की सेना आमने सामने नहीं होती है, जिसमें प्रत्यक्ष रूप से किसी प्रकार का अस्त्र – शास्त्र का प्रयोग नहीं होता है बल्कि उन देशो के बीच घोर वैचारिक मतभेद होता है। यह मतभेद इस सीमा तक होता है जो, उसे लगभग वास्तविक युद्ध जितना ही भयावह बना देता है। वास्तव में, यह युद्ध जमीन पर नहीं लड़ा जाता है बल्कि यह युद्ध मानवो के मस्तिष्क में लड़ा जाता है। इस तरह से शीत युद्ध दो या दो से अधिक शक्तिशाली गुटों के बीच भयंकर दुश्मनी की स्थिति होती है। वे परस्पर एक दूसरे को अपना परम शत्रु  मानते है और हमेशा उनसे सशंकित रहते है।

Cold War

शीत युद्ध क्या है (What is Cold War in Hindi)

शीत युद्ध शब्द की उत्त्पत्ति अमरीका और सोवियत संघ रूस के बीच उत्पन्न तनाव के लिए हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध की अवधि में संयुक्त राज्य अमरीका, ग्रेट ब्रिटैन, फ्रांस और रूस मिलकर धुरी राष्ट्रों – जर्मनी, जापान और इटली के विरुद्ध  युद्ध लड़ा था। मगर युद्ध समाप्त होते होते स्थिति बदल गई। अब अमरीका और रूस एक दूसरे के आमने सामने आ गए। वे एक दूसरे को अपना प्रतिद्वंती मानने लगे। उनके बीच वैचारिक मतभेद खुलकर देखे जाने लगे। यद्यपि इन देशो के बीच आमने – सामने का युद्ध कभी नहीं हुआ मगर फिर भी शीत युद्ध उससे कम भयानक नहीं था। इन देशो के बीच उत्पन्न तनाव ने दुनिया के कई देशो को दो अलग अलग गुटों में बाँट दिया था । जो गुट अपने आपको निष्पक्ष भी मानते थे, वास्तव में, वे भी निष्पक्ष नहीं थे। कही न कही वे भी किसी एक के पक्ष में ही थे।

अधिकांश इतिहासकारो का मानना है कि संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ रूस के बीच शीत युद्ध (Cold War) की अवधि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अर्थात 1945 से लेकर 1991 तक रहा। इसके बाद 1991 में सोवियत संघ रूस के टूटते ही इसका समापन हो गया।

शीत युद्ध के कारण (Cold War Reason)

अमरीका और सोवियत संघ रूस के बीच संदेह और अविश्वास की स्थिति –  द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होते होते दोनों राष्ट्रों के बीच अविश्वास और संदेह की स्थिति उत्पन्न हो गई और धीरे धीरे इसमें लगातार वृद्धि ही होती चली गई। दोनों एक दूसरे को अपना परम शत्रु व चुनौती मानते थे। इस कारण वे दोनों अपने पक्ष में अधिक से अधिक देशो को शामिल करने लग गए। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व के अलग अलग विवादों में ये दोनों देश आमने सामने दिखने लग गए। अमरीका को यूरोप का सहयोग मिल रहा था क्योकि अमरीका की तरह यूरोपीय देशो के भी रूस के साथ वैचारिक मतभेद था। रूस की पूंजीवादी विरोधी नीतिया यूरोपीय देशो के लिए चिंता का कारण था और इस कारण यूरोपीय देश रूस से दुरी बनाने में ही अपनी समझदारी समझी। इस कारण से भी शीत युद्ध को बल मिला।

अमरीका और रूस के बीच वैचारिक मतभेद –  अमरीका और रूस के बीच घोर वैचारिक मतभेद था। जहाँ अमरीका एक पूंजीवादी लेकिन लोकतान्त्रिक देश का प्रतिनिधित्व करता है तो वही रूस साम्यवादी व एक दलीय पद्धति वाला देश है। ये वैचारिक मतभेद शीत युद्ध के प्रमुख कारणों में से एक था। इतना ही नही, आज भले ही उन दोनों के बीच शीत युद्ध जैसी स्थिति नहीं है क्योकि अब रूस की शक्ति में कमी आ गई है मगर स्थिति अब भी वैसी की वैसी ही है। आज भी दोनों की विदेश नीतियां इससे प्रभावित होते रहे है। आज भी दोनों देशो की आंतरिक शासन पद्धति अथवा देश चलाने के तरीके एक दूसरे से बिलकुल अलग है।

अन्य कारण

  • सोवियत संघ का अमरीका से अलग हटकर कई मुद्दों पर वीटो का प्रयोग करना।
  • दोनों देशो के द्वारा अपने गुटों का विस्तार करना। अमरीका ने पश्चिमी देशो के साथ मिलकर नाटो का गठन किया तो सोवियत संघ ने भी पूर्वी यूरोपीय देशो के साथ मिलकर वॉरसा संधि किया।
  • पुनः जो देश सैद्वांतिक रूप से या यूँ कहे प्रत्यक्ष रूप से दोनों में से किसी के साथ नहीं थे। वे भी व्यहारिक रूप से रूस या अमरीका में से किसी एक के साथ थे। जिसमें भारत भी एक था। कहने को भारत किसी गुट में शामिल नहीं था मगर नेहरू की विदेश नीति के कारण भारत का झुकाव रूस की ओर था। अब यही कारण था कि अमरीका पहले भारत से दुरी बनाये रखता था। मगर मोदी सरकार के आने के बाद कांग्रेस वाली विदेश नीतियों में परिवर्तन हुआ और अब अमरीका भी भारत के काफी करीब आ गया है। लेकिन रूस अब भी भारत का सच्चा दोस्त बना हुआ है।
  • रूस के द्वारा शांति को भंग करना। रूस विश्व के कई स्थानों पर ऐसे कार्य करने लगा जो युद्ध कि स्थिति उत्पन्न करने वाली थी। परिणाम यह हुआ कि अमरीका व उसके सहयोगी देश उसके विरोध में आते चले गए।

शीत युद्ध के परिणाम (Cold War Result)

आतंकवाद की नींव तैयार करने का कार्य – शीत युद्ध के कई बुरे परिणाम देखने को मिले। विश्व के अनेक देश चाहे वे इनके गुट में थे या न थे फिर भी वे इससे कम या ज्यादा अवश्य प्रभावित हुए। दोनों देशो ने अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु व अपने वर्चस्व के लिए हर वो कार्य किया जो मानव सभ्यता को कलंकित करने वाला था। उन्ही में से एक है – इस्लामिक आतंकवाद। आज भारत सहित विश्व के कई देश इस्लामिक आतंवाद से ग्रसित है। वास्तव में, इसका आधार इन देशो के सहयोग से ही तैयार हुआ था। जिसको आज भारत भोग रहा है। इन दोनों देशो ने ही अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए अलग अलग देशो में इस्लामिक आतंकवादी संघटनो को फलने फूलने में सहयोग किया। इस तरह से आज का इस्लामिक आतंकवाद के जड़ में शीत युद्ध ही है और यह शीत युद्ध का सबसे बुरे परिणामो में से एक है।

विश्व के अधिकांश देशो का दो गुटों में विभाजित हो जाना – शीत युद्ध विश्व को दो गुटों में बाँट दिया। प्रथम अमरीका के नेतृत्व वाला गुट तो दूसरा सोवियत संघ वाला गुट।

विश्व में हथियारों की होड़ – दोनों ही देश एक दूसरे को सशंकित दृष्टि से देखते रहे है। परिणाम यह हुआ कि वे एक दूसरे से भयभीत रहने लगे। इस कारण वे दोनों अपने आपको दूसरे से अधिक शक्तिशाली बनने के लिए आधुनिकतम हथियारों का निर्माण करने में लग गए। इस तरह से विश्व में हथियारों की होड़ शुरू हो गई।

विश्व में भय का माहौल – दोनों ही देश परमाणु संपन्न देश बन चुके थे और इनके पास परमाणु बमो की संख्या भी बहुत अधिक थी। इतना ही नहीं वर्तमान में भी दुनिया में जितने परमाणु बम है, उनका 90 प्रतिशत इन्ही दो देशो के पास है। इस कारण समूचा विश्व भय की साया में जीने को मजबूर थे क्योकि दुनिया को भय था कि इन दोनों देशो के बीच का युद्ध समूची दुनिया के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।

अन्य परिणाम

  • परमाणु युद्ध के भय के कारण भले ही इन दोनों देशो के बीच प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ मगर इसके बावजूद शीत युद्ध के कारण विश्व में कई समस्याओ का जन्म हुआ जो आज तक नासूर बना हुआ है। इन्ही दोनों देशो के बीच होने वाले शीत युद्ध के कारण इस्लामिक देशो की शक्तियों में कई गुणा वृद्धि हो गई।
  • शीत युद्ध का प्रभाव भारत पर भी पड़ा। कश्मीर समस्या के साथ साथ भारत की कई अन्य समस्याओ के पीछे एक बड़ा कारण शीत युद्ध भी था। शीत युद्ध के कारण ही अमरीका भारत से दुरी रखता था और वो पाकिस्तान की खुल कर सहयोग करता रहा था क्योकि अमरीका की दृष्टि में भारत रूस का एक सहयोगी देश था जबकि अमरीका रूस के किसी भी सहयोगी देश को पसंद नहीं करता था।
  • ईरान और अफगानिस्तान विवाद के पीछे भी शीत युद्ध एक बड़ा कारण था। ईरान और अफगानिस्तान की इस्लामिक कट्टरता के अभ्युदय के पीछे भी शीत युद्ध ही था। दोनों ही देश अपना वर्चश्व स्थापित करने के लिए किसी भी सीमा तक जा रहे थे। इस तरह विश्व में कई समस्याओ का जन्म हुआ।

शीत युद्ध की समाप्ति (End of the Cold War)

सन् 1990 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही रूस कमजोर पड़ गया। रूस के कमजोर पड़ने पर शीत युद्ध का कोई औचित्य नहीं रह गया। क्योकि अब विश्व में अमरीका ही सर्वोसर्वा हो गया। अमरीका अब विश्व का अकेला सुपर पॉवर बन कर उभरा। इसलिए इसके बाद शीत युद्ध स्वतः समाप्त हो गया क्योकि रूस आर्थिक रूप से भी कमजोर पड़ चुका था। रूस के पास इतनी शक्ति नहीं रही थी कि वो अमरीका का अकेले सामना कर सकें। परिणाम यह हुआ कि रूस अमरीका के सामने झुकने को बेबस हो गया। इस तरह शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही विश्व में दो गुटों वाली स्थितियों का भी अंत हो गया। लेकिन जाते जाते इसने विश्व को कई ऐसे समस्याएं दे दीं है जिसका अंत करना आज भी सभी के लिए चुनौती बनी हुई है।

FAQ

Q : शीत युद्ध कब से कब तक चला?
Ans : शीत युद्ध 1945 से 1991 तक चला।

Q : शीत युद्ध की शुरुआत कब हुई थी?
Ans : 12 मार्च 1947 से 26 दिसम्बर 1991 तक।

Q : कोल्ड वॉर के कितने चरण थे?
Ans : कोल्ड वॉर के चार चरण थे।

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मेरा नाम अशोक जांगिड है. मैं जयपुर राजस्थान में रहता हूँ. मुझे कई सालो का ब्लॉग्गिंग का अनुभव है.

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