1962 के भारत-चीन युद्ध का इतिहास कारण, और परिणाम | China India War History In Hindi

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1962 के भारत-चीन युद्ध का इतिहास कारण, और परिणाम | China India War History In Hindi

भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ था जबकि उसके लगभग दो वर्ष बाद अर्थात 1 अक्टूबर, 1949 को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई थी। उस समय कांग्रेस की नेहरू सरकार चीन से लगातार दोस्ती का हाथ बढ़ा रही थी। नेहरू चीन के प्रति इतने उदार थे इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत जापान के साथ किसी वार्ता में इसलिए शामिल नहीं हुआ क्योकि उसमे चीन को शामिल नहीं किया गया था। नेहरू की चीन के प्रति उदारता केवल इतने भर तक सीमित नहीं था। नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता लेने से इसलिए इंकार कर दी क्योकि नेहरू चाहते थे कि भारत के बदले चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की सदस्यता दी जाएँ। उस समय नेहरू पर उदारता का इतना धुन सवार था कि वे विश्व अन्य देशो के बीच चीन को सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता दिलवाने के लिए प्रचार कर रहे थे और फिर वही हुआ, जो भारत के लिए आज तक संकट बना हुआ है। भारत के बदले चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बना दिया गया। तो ऐसे थे जवाहर लाल नेहरू। नेहरू ने केवल इतने भर गलतियां नहीं की थी बल्कि उनकी गलतियों से उनका पूरा का पूरा कार्यकाल भरा था। उन्ही गलतियों में एक गलती का परिणाम था 1962 के चीन – भारत युद्ध में भारत की शर्मनाक पराजय। China India War

 

1962 का भारत और चीन युद्ध का इतिहास (China India War History In Hindi)

चीन ने 20 अक्टूबर, 1962 को भारत पर आक्रमण कर दिया। इसके बाद भारत और चीन के बीच लगभग एक महीने तक युद्ध चला। इस युद्ध में भारत की बुरी तरह से हार हुई थी। इस युद्ध से पहले नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का खूब नारा दिया था। नेहरू न केवल चीन के प्रति लापरवाह थे बल्कि वे देश की सुरक्षा के प्रति भी बिलकुल भी जागरूक नहीं थे। उसी का परिणाम था 1962 के युद्ध में चीन के हाथो भारत की भारी पराजय हुई।

ऐसा नहीं था कि नेहरू को चीन की नियत के बारे में पता नहीं था। देश के पहले गृह मंत्री व लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले नेहरू को चीन की नियत से अवगत कराते हुए एक पत्र लिखी थी। जिसमे उन्होंने नेहरू को चीन से सावधान रहने की सलाह दी थी। नेहरू को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा था कि भले ही हम चीन को मित्र के रूप में देखते है मगर वामपंथी चीन की अपनी महत्वाकांक्षाए और उद्देश्य है। हमें उससे सावधान रहना चाहिए। उन्होंने आगे लिखा था कि तिब्बत के चीन में मिल जाने के बाद चीन अब हमारी सीमा तक पहुंच गया है। मगर नेहरू ने सरदार पटेल की बात को भी अनसुनी कर दी। क्योकि उन्हें अपनी उदारता वाली नीति पर बड़ा घमंड था और गाँधी की भांति वे भी अपने सामने किसी को भी महत्व नहीं दिया करते थे। नेहरू के द्वारा किये गए अनेको गलतियों को देश को आज भी भुगतना पड़ रहा है।

1962 में हुए चीन और भारत के बीच युद्ध के कारण (China India War)

चीन और भारत के बीच हुए युद्ध का मुख्य कारण सीमा विवाद था। ऐसा नहीं है कि युद्ध से पहले चीन के साथ भारत का सीमा विवाद नहीं था या युद्ध के बाद सीमा विवाद समाप्त हो गया। बल्कि उस विवाद का अधिक बढ़ जाना ही युद्ध का मुख्य कारण बना था।

चीन और भारत के बीच युद्ध का एक प्रमुख कारण 1959 में तिब्बती गुरु दलाई लामा का भारत में शरण लेना भी था। दलाई लामा को चीन अपना शत्रु मानता था और जब दलाई लामा भाग कर भारत में शरण लिया तो चीन को लगा कि भारत उसके शत्रु का साथ दे रहा है। परिणाम यह हुआ कि कम्युनिष्ट चीन भारत से चिढ गया और मौका देखकर भारत पर आक्रमण कर दिया।

युद्ध में भारत के पराजय के कारण (India China war why India lost)

नेहरू का चीन के प्रति अति विश्वास युद्ध में भारत का एक प्रमुख कारण था। नेहरू देश की सुरक्षा को लेकर भी लापरवाह थे। जिसका परिणाम देश को न केवल युद्ध में पराजय के रूप में भोगना पड़ा बल्कि कई ऐसी स्थिति बनी जिसको भारत आज भी भोग रहा है।

युद्ध से पहले भारतीय सेना का तैयार नहीं होना भी भारत की पराजय का एक प्रमुख कारण था। युद्ध से पहले भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर विवाद हो गया था मगर प्रधानमंत्री नेहरू और देश की सेना को पूरा विश्वास था कि स्थिति युद्ध तक नहीं पहुंचेगी और जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। यही सोचकर युद्ध के क्षेत्र में सैनिको की केवल दो टुकड़ियों को तैनात किया गया था परन्तु इसी के विपरीत चीन पूरी तैयारी में था और उसने युद्ध क्षेत्र में भारी संख्या में सेना तैनात कर दी थी।

यह युद्ध चीन के 80 हजार सेना और भारत के 10 से 20 हजार सेना के बीच हुआ। स्थिति स्पष्ट है कि वो बराबरी का युद्ध नहीं था। परिणाम यह हुआ कि इस युद्ध में भारत को पराजय का सामना करना पड़ा।

चीनी सैनिक संख्या में भी अधिक थे और उनके पास अधिक आधुनिक अस्त्र शस्त्र भी थे। चीनी सैनिको ने सीमा पर लड़ रहे भारत के सैनको का सेना मुख्यालय से संपर्क तोड़ने के लिए टेलीफोन लाइन को भी काट दिया था। परिणाम यह हुआ कि सेना की कई टुकड़ियों का सेना मुख्यालय से संपर्क टूट गया।

आस्ट्रेलियाई पत्रकार नेविल मैक्सवेल जो उस समय नई दिल्ली में एक मैगजीन के लिए लिखा करते थे, उन्होंने अपनी एक किताब इंडियाज चाइना वार में दावा किया है कि हार के लिए नेहरू की नीतियां ही मुख्य रूप से जिम्मेदार थी। नेहरू ने देश की सुरक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया। सेना के पास अस्त्र – शस्त्र की भारी कमी थी। सेना संसाधनों की कमी का सामना कर थी। दूसरी ओर सरकार, सेना के शीर्ष अधिकारी और सीमा पर लड़ रहे सैनको के बीच तालमेल की बहुत कमी थी। जिस कारण एक महीने तक चले युद्ध में चीन को आसानी से विजय प्राप्त हो गया और भारत की हार हो गई।

उस समय के तात्कालिक रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन का देश की सुरक्षा को लेकर लापरवाह होना, भारत के हार का एक मुख्य कारण था। नेहरू रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर अधिक विश्वास करते थे। नेहरू मेनन के द्वारा दिए गए रिपोर्ट पर पूरा विश्वास करते थे। भारत के हार का एक मुख्य कारण रक्षा मंत्री मेनन और सेना के उत्तर पूर्व क्षेत्र के कमांडर बीएम कौल का लापरवाही पूर्ण किया गया कार्य भी था। कौल को उत्तर पूर्व के कमांडर पद रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन के कारण मिला था जबकि वे उस पद के लायक नहीं थे। उन्हें युद्ध का कोई अनुभव नहीं था। परिणाम यह हुआ कि जब युद्ध हुआ तो कौल बीमार पड़ गए परन्तु बिमारी में भी वे युद्ध की जिम्मेदारी घर से लेते रहे। इससे सेना के युद्ध भूमि के लड़ाई पर बुरा प्रभाव पड़ा। इस तरह से रक्षामंत्री मेनन और उत्तर पूर्व के कमांडर बीएम कौल के कारण भारत को पराजय का सामना करना पड़ा। इस कारण युद्ध समाप्ति के बाद दोनों को ही अपने पद से हटा दिया गया।

1962 के चीन – भारत युद्ध में भारत के हार का सबसे प्रमुख कारण उस समय के तात्कालिक प्रधानमंत्री नेहरू थे। हैंडरसन ब्रुक्स की एक  रिपोर्ट के आधार पर पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने दावा किया है कि 1962 के युद्ध में भारत के हार के लिए जिम्मेदार केवल और केवल तात्कालिक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे। नेविल उस समय नई दिल्ली में टाइम्स ऑफ लन्दन के लिए काम करते थे। 1962 की लड़ाई के बाद भारत के हार के कारणों की जाँच जनरल हैंडरसन ब्रुक्स और ब्रिगेडियर पीएस भगत ने की थी।

भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु

  • 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। भारतीय सेना चीन के आक्रमण से पहले तैयारी में नहीं थी। परिणाम यह हुआ चीन के 80 हजार सैनिको से सामना करने के लिए भारत के पास सीमा पर मात्र 10 से 20 हजार सैनिक ही थे।
  • 1962 में हुए चीन – भारत युद्ध 20 अक्टूबर, 1962 से आरम्भ होकर 21 नवंबर, 1962 तक चीन एक एकतरफा संघर्ष विराम के साथ हुआ। इस तरह चीन – भारत युद्ध एक महीना चला।
  • भारत – चीन युद्ध में दोनों ही पक्षों के द्वारा केवल थल सेना ही भाग लिया। इस युद्ध में दोनों ही पक्षों के द्वारा नौसेना और वायुसेना ने भाग नहीं लिया।
  • भारत और चीन के बीच युद्ध का मुख्य कारण 4 हजार किलोमीटर की सीमा थी। ये सीमा निर्धारित नहीं थी और यह आज तक भी निर्धारित नहीं हो पाई है। भारत और चीन दोनों का ही जहाँ – जहाँ तक अधिकार है वही क्षेत्र नियंत्रण रेखा के नाम से जाना जाता है। यह नियंत्रण रेखा 1914 में मैकमोहन ने निर्धारित की थी परन्तु चीन इस मैकमोहन रेखा को नहीं मानता है और वो आज भी इसका उलंघन करता रहता है।
  • इस युद्ध में भारत की ओर से 1383 सैनिक शहीद हुए थे तो वही चीन के  लगभग 722 सैनिक मारे गए थे। वही भारत की ओर से 1,047 सैनिक घायल हुए थे तो चीन की ओर से 1697 सैनिक घायल हुए थे।
  • इस युद्ध का परिणाम यह हुआ कि भले ही चीन ने एकतरफा संघर्ष विराम कर दिया था मगर उसने भारत के कई क्षेत्रो पर स्थायी कब्ज़ा करने में सफलता पा ली थी और जो आज भी उसके कब्जे में है।
  • चीन का भारत के साथ युद्ध में एकतरफा संघर्ष विराम का कारण यह था कि चीन को लग गया कि भारत का साथ देने के लिए अमरीका युद्ध में कूद जाएगा। उस समय चीन के पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वो अमरीका जैसे विश्व शक्ति से अकेले सामना कर सके। परिणाम यह हुआ कि वो महीने भर में अपनी ओर से ही अचानक संघर्ष विराम कर दिया।
  • इस युद्ध में चीन की सैनिको की संख्या भारत की सैनिको की संख्या की चार गुनी से भी अधिक थी।
  • इस युद्ध में भारत का चीन के हाथो बुरी तरीके से पराजय हो गया था।
  • भारत के पराजय के मुख्य कारण नेहरू की अदूरदर्शी नीति और देश की सुरक्षा को लेकर गंभीर का न होना था।

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