पानीपत का पहला, दूसरा और तीसरा युद्ध कब हुए | Panipat War History in Hindi

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पानीपत का प्रथम, द्वितीय तृतीय युद्ध कब हुआ, कारण, परिणाम, इतिहास | Panipat War History in Hindi, Panipat First, Second and Third War, Battle,  Details, PDF

भारत के इतिहास में पानीपत के मैदान में कुल 3 युद्ध लड़े गए है. ये तीनों युद्ध भारतीय इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. पानीपत के मैदान में लड़ी गई दो लड़ाई विशुद्ध रूप से मध्यकाल में लड़ी गई थीं और तीसरी लड़ाई मध्ययुगीन और आधुनिक काल के बीच के संक्रमण काल ​​में लड़ी गई थी. आज के इस आर्टिकल में हम आपको पानीपत का प्रथम, द्वितीय तृतीय युद्ध (Panipat War History in Hindi) कब हुआ, कारण, परिणाम, इतिहास के बारें में पूरी जानकारी देने वाले है.

Panipat War History in Hindi

भारत के इतिहास में अनेक युद्धों का वर्णन मिलता है मगर पानीपत का युद्ध का विशेष महत्व है। वैसे तो पानीपत की भूमि पर अनेक युद्ध हुए थे मगर उनमें से तीन युद्ध अधिक महत्वपूर्ण माने जाते है। ये तीन युद्ध क्रमशः 1526, 1556, और 1761 के कालखंड में हुए थे। इतिहास में इन्हे पानीपत का प्रथम युद्ध, पानीपत का द्वितीय युद्ध और पानीपत का तृतीय युद्ध के नाम से जाना जाता है। 1526 का युद्ध बाबर और इब्राहिक लोदी के बीच, 1556 का युद्ध अकबर और हेमू के बीच और 1761 का युद्ध अफगान लुटेरे अहमद शाह अब्दाली व मराठो के बीच हुआ था।

पानीपत के तीनो युद्धों का संक्षिप्त कालखंड

  • पानीपत का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल 1526 को हुआ था जिसमें बाबर की सेना की जीत हुई थी जबकि इब्राहिम लोदी की सेना की हार हुई थी।
  • पानीपत का द्रितीय युद्ध 5 नवंबर 1556 को हुआ था जिसमें मुस्लिम अकबर की विजय हुई थी जबकि हिन्दू शासक हेमू (हेमचन्द्र विक्रमादित्य) की पराजय हुई थी।
  • पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी 1761 को हुआ था, इसमें अहमद शाह अब्दाली की सेना विजय हुई थी जबकि पुणे के सदाशिव राव भाऊ पेशवा (मराठा शासक) की पराजय हुई थी।

पानीपत की तीनो लड़ाई हरियाणा के पानीपत में हुई थी। महाभारत काल में इस क्षेत्र को पाण्डुप्रस्थ के नाम से जाना जाता था और भगवान श्री कृष्ण के द्वारा पांडवो के लिए दुर्योधन से मांगे गएँ पांच गावों में एक गांव यह भी था। वर्तमान में पानीपत हरियाणा का एक प्रमुख औद्योगिक शहर है जो देश की राजधानी दिल्ली से मात्र 90 किलोमीटर दूर स्थित है। 

पानीपत का प्रथम युद्ध (First Panipat War)

पानीपत का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल 1526 में इब्राहिम लोदी और बाबर के बीच हुई थी। इस युद्ध में इब्राहिम लोदी के साथ साथ उसके पंद्रह हजार सैनिक भी मारे गए थे। इस युद्ध के बाद दिल्ली पर बर्बर इस्लामिक लुटेरा बाबर का कब्ज़ा हो गया था।

पानीपत के प्रथम युद्ध के कारण (Cause of the First Panipat War)

पानीपत के प्रथम युद्ध का मुख्य कारण बाबर का भारत में साम्राज्य विस्तार करना था। लुटेरे व आक्रांता बाबर की बुरी दृष्टि दिल्ली पर लगी हुई थी। इस कारण इब्राहिम लोदी की सेना से बाबर की सेना की पानीपत में भयानक लड़ाई हुई। जिसमें बाबर की जीत हुई।

पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणाम (Results of the First Panipat War)

पानीपत का प्रथम युद्ध एक निर्णायक युद्ध था। इस युद्ध में लोदी की हार हुई और बाबर की जीत हुई। इस युद्ध के बाद लोदी वंश का सफाया हो गया और लुटेरा व आक्रांता बाबर को दिल्ली समेत समूचे उत्तर भारत में आकर लूटपाट, हत्या करने का पूरा अवसर मिला। इस युद्ध के बाद लुटेरा, आक्रांता, बर्बर हत्यारा बाबर ने मुगल साम्राज्य की स्थापना की और फिर उस आक्रांता बाबर ने अपनी इस्लामिक कट्टरता को फैलाते हुए शासन करना आरम्भ किया।

पानीपत की दूसरी लड़ाई (Second Panipat War)

पानीपत का द्वितीय युद्ध 5 नवंबर 1556 को हुआ था जिसमें मुस्लिम अकबर की विजय हुई थी जबकि हिन्दू शासक हेमू (हेमचन्द्र विक्रमादित्य) की पराजय हुई थी। इस युद्ध में हिन्दू शासक हेमचन्द्र विक्रमादित्य बहुत ही वीरता से लड़ाई लड़ी मगर एक समय ऐसा आया जब वो अकबर की सेना के छल के शिकार हो गए। अकबर की सेना की ओर से एक तीर उनकी आँखों में आकर लग गयी। आँख में तीर का लगना ही हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) के पराजय व मृत्यु का कारण बना। आँख में तीर के लगने के कारण वो अचेत हो गए। उनके अचेत होते ही उनकी सैनिक में भगदड़ मच गई। इस भगदड़ का पूरा पूरा लाभ अकबर की इस्लामिक बर्बर आक्रांता सैनको ने उठाया। मुगल सेना हेमू की सेना का भयानक तरीके से कत्लेआम करना शुरू कर दिया। इससे हेमू की सेना में और भी हलचल बढ़ गई और एक जीता हुआ युद्ध वो हार गएँ।

इस युद्ध में हेमचन्द्र विक्रमादित्य उर्फ हेमू की मृत्यु के बारें में इतिहास में दो अलग अलग तथ्य है। कुछ इतिहासकारो का मानना है कि बुरी तरह से घायल व अचेत सम्राट हेमू की मृत्यु उसी भगदड़ में घोड़ो के कुचले जाने के कारण हो गयी थी और बाद में उनके शव को अकबर की सेना के द्वारा कब्ज़ा कर लिया गया था। लेकिन कुछ इतिहासकारो का मानना है कि हेमू की सेना में मची भगदड़ का लाभ उठाकर अकबर की ओर से लड़ रहे बैरम खां ने बुरी तरह से घायल व अचेत सम्राट हेमू का सिर काट लिया। इस तरह से एक जीता हुआ युद्ध अंतिम समय में हेमू हार गए। वास्तव में, इस युद्ध में हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) ने अकबर की इस्लामिक सेना को हरा दिया था, लेकिन एक तीर ने जीती हुई बाजी अकबर के हाथ में कर दी।

पानीपत की दूसरी लड़ाई के कारण (Cause of the Second Panipat War)

हिन्दू शासक हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) की बढ़ती शक्ति से अकबर के संरक्षक बैरम खा घबरा गया था। उसे भय था कि यदि उसकी सेना हिन्दू शासक हेमू को पराजित नहीं करेगा तो फिर वो दिन दूर नहीं है जब उसे भारत से भागकर काबुल में शरण लेना पड़ें। बैरम खा मुगलो के भविष्य को लेकर चिंतित था। उसने अपनी चिंता तेरह वर्षीय अकबर को बताया। इसके बाद बैरम खां ने अकबर को इस युद्ध के लिए तैयार किया, जो पानीपत के द्वितीय युद्ध का कारण बना। हालाकिं इस युद्ध में मुगल आक्रांता अकबर की जीत हुई थी और हिन्दू शासक हेमू की जीती हुई बाजी हार में बदल गई। इसलिए यह कहा जा सकता है कि इस युद्ध में अकबर का किस्मत ने साथ दिया था।

पानीपत की दूसरी लड़ाई के परिणाम (Results of the Second Panipat War)

पानीपत के द्वितीय युद्ध के बाद दिल्ली और आगरा पर अकबर का कब्ज़ा हो गया। इसके बाद अगले तीन सौ वर्षों पर मुगलो ने दिल्ली पर शासन किया। इस युद्ध ने यह सुनिश्चित कर दिया कि मुगलो से टक्कर लेने की शक्ति तात्कालिक राजाओ व सम्राटो में से किन्ही में भी नहीं थी।

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पानीपत की तीसरी लड़ाई (Third Panipat War)

पानीपत का तीसरा युद्ध अठारहवीं सदी का सबसे भयानक युद्ध था। भारत के इतिहास में इस युद्ध को सबसे भयानक व बर्बर इसलिए भी माना जाता है क्योकि इस युद्ध में सबसे अधिक सैनिको की हत्या हुई थी।

इस युद्ध के पहले आक्रमण में तो मराठों को विजय मिली मगर विश्वासराव की हत्या हो गई। इसके बाद फिर जो भयंकर युद्ध हुआ उसमें सदाशिवराव भी मारे गएँ। दो प्रमुखों के मारे जाने के मराठों का साहस दम तोड़ दिया और फिर अंत में मराठो की बुरी तरह से पराजय हो गई। इस युद्ध के बाद मराठों का उत्तर भारत पर से पकड़ उखड़ गई और समूचे महाराष्ट्र में निराशा फैल गई। इस युद्ध में मराठो के इतने भयानक हार के कई कारण माने गए है। उन कारणों में एक महत्वपूर्ण कारण मराठा सरदारों में आपसी तालमेल की भारी कमी एवं वैचारिक मतभेद भी माना गया है।

पानीपत का तृतीय युद्ध मराठा शासको के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था। हालांकि इस युद्ध में मराठो की बुरी तरह से पराजय हुई थी। इतना ही नहीं यह हार इतिहास में मराठो की सबसे बड़ी हार थी। उत्तर भारत से पकड़ भी समाप्त हो गई फिर भी इस युद्ध के बाद भी उनकी शक्ति में अधिक कमी नहीं आयी और न ही उनके उद्देश्य में कोई बदलाव आया। माना जाता है इस युद्ध के बाद वे अधिक संगठित हुए और भविष्य की रणनीति पर अपने ध्यान को केंद्रित किया। 

पानीपत की तीसरी लड़ाई के कारण (Cause of the Third Panipat War)

अफगानी लुटेरा अहमद शाह अब्दाली को रोकने के लिए मराठो ने यह युद्ध लड़ा था। मगर मराठो के सरदारों में आपसी तालमेल की कमी के कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। मराठो के लिए यह पराजय मराठो के इतिहास में सबसे बड़ी पराजय थी।

1759 – 60 ई में  मराठो ने पंजाब पर अपनी शासन की स्थापना कर ली थी। इसके बाद अफगानी लुटेरा अहमद शाह अब्दाली का पंजाब पर आक्रमण हुआ। उस युद्ध में वो कुछ ज्यादा तो नहीं कर पाया मगर अब्दाली का ध्यान पंजाब पर लगा था। दूसरी ओर पंजाब के स्थानीय राजपूत भी मराठो के पराजय के लिए अहमद शाह अब्दाली को बुलाया था, जो पानीपत के तृतीया युद्ध का कारण बना।  

पानीपत की तीसरी लड़ाई के परिणाम (Results of the Third Panipat War)

पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 में अफगानी आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली और पुणे के सदाशिवराव भाऊ के द्वारा संघटित मराठों के बीच हुआ था। इस युद्ध में मराठों की बुरी तरह से पराजय हुई थी। इस युद्ध के बाद अंग्रेजो के लिए भारत पर आक्रमण करने का एक नया मार्ग खोल दिया, जो बाद में भारत के लिए बहुत ही भयानक साबित हुआ और भारत को करीब दो सौ वर्षों तक अंग्रेजो के अधीन रहना पड़ा। 

इस युद्ध में न केवल सैनिक बल्कि अनेक निर्दोष हिन्दुओ की भी हत्या हुई थी। युद्ध से पहले अहमद शाह अब्दाली के सैनको ने चालीस हजार हिन्दू श्रद्धालुओं की हत्या की थी जबकि इस युद्ध में एक लाख से अधिक सैनिक मारे गए थे। इस युद्ध में मराठा सैनिको का नेतृत्व कर रहे प्रायः सभी छोटे बड़े नायक की हत्या हो गई थी। मराठो के इतिहास में यह सबसे बड़ी क्षति मानी जाती है।

पानीपत के तीनो युद्धों के अलग अलग प्रभाव 

पानीपत की पहली लड़ाई ने जहाँ मुगलो की नीव को मजबूत कर दिया तो वही दूसरी लड़ाई ने अकबर की शासन की नीव को मजबूत कर दिया जबकि तीसरी लड़ाई ने अग्रेजो के लिए मार्ग खोल दिया।

निष्कर्ष– आज के इस लेख में हमने आपको बताया पानीपत का प्रथम, द्वितीय तृतीय युद्ध (Panipat War History in Hindi) कब हुआ, कारण, परिणाम, इतिहास के बारें में बताया. उम्मीद करते है आपको यह जानकारी जरुर पसंद आई होगी.

FAQ

Q : भारत का प्रथम युद्ध कब हुआ था?
Ans : 1526 में

Q : भारत का द्वितीय युद्ध कब हुआ था?
Ans : 1556 में

Q : भारत का तीसरा युद्ध कब हुआ था?
Ans : 1761 में

Q : पानीपत युद्ध 1 किसने जीता?
Ans : पानीपत युद्ध 1 बाबर और इब्राहिक लोदी के बीच हुआ, इस युद्ध में बाबर की जीत हुई

Q : पानीपत युद्ध 2 किसने जीता?
Ans : पानीपत युद्ध 2 अकबर और हेमू के बीच हुआ, इस युद्ध में अकबर की जीत हुई

Q : पानीपत युद्ध 3 किसने जीता?
Ans : पानीपत युद्ध 3 अहमद शाह अब्दाली व मराठो के बीच हुआ, इस युद्ध में अहमद शाह अब्दाली की जीत हुई

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