चीन-ताइवान के बीच विवाद | China Taiwan Conflict In Hindi

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चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग ने कई बार अमेरिका को चेतावनी और हमलो की धमकी दी है और कहा कि हमारे मामलो में दखलअंदाजी न करे. इसके बावजूद भी अमेरिका संसद की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने 2 अगस्त 2022 को ताइवान पहुंचकर सभी को असमंजस में डाल दिया है. नैंसी के ताइवान दौरे को चीन की लाख कौशिश के बाद भी नही रोक पाया. नैंसी के इस दौरे के बाद चीन बौखला सा गया है और अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा है कि इसके परिणाम गंभीर हो सकते है. चीन द्वारा बनाई गई वन चाइना पॉलिसी के अंतर्गत ताइवान चीन का हिस्सा है. ताइवान और चीन के बीच विवाद 73 साल से चल रहा है. वन चाइना पॉलिसी के तहत अमेरिका को ताइवान से कोई रिश्ता नहीं रखना था, लेकिन फिर भी अमेरिका ने चीन को उकसा दिया है.

तो आज के इस लेख में हम आपको चीन-ताइवान के बीच विवाद (China Taiwan Conflict In Hindi), ताइवान कैसे चीन से अलग हुआ और वन चाइना पॉलिसी क्या है? के बारे में पूरी जानकारी देने वाले है.

चीन-ताइवान के बीच विवाद | China Taiwan Conflict In Hindi

ताइवान पूर्व एशिया में स्थित और चीन के दक्षिण-पूर्वी तट से करीब 100 मील दूर एक द्वीप है. यह एक छोटा सा फॉर्मोसा द्वीप था लेकिन आस पास के द्वीप को मिलकर ताइवान बना. ताइवान खुद को एक संप्रभु राष्ट्र समझता है. और अपना सविधान भी है. यहाँ तक कि ताइवान में जनता द्वारा सरकार भी चुनी जाती है. चीन की कम्युनिस्ट सरकार ताइवान को अलग प्रांत नही बल्कि चीन का हिस्सा बताती है. चीन कई सालों से ताइवान को अपने कंट्रोल में करना चाहता है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन और ताइवान के पुन: एकीकरण पर कई बार जोर दिया. अगर हम इतिहास देखे तो कभी ताइवान कभी चीन का हिस्सा हुआ करता था.

ताइवान चीन से कैसे अलग हुआ

यह कहानी शुरू होती है 17वीं शताब्दी से. उस समय चीन में क्विंग वंश का शासन हुआ करता था. उस वक्त ताइवान चीन का भाग हुआ करता था. क्विंग वंश के राजा कमज़ोर हुआ करते थे और इस कमज़ोरी का फायदा जापान ने उठाया.  साल 1894-1895 में जापान ने चीन पर हमला कर दिया और कोरिया एवं ताइवान पर कब्ज़ा कर लिया और चीनी सेना की जबरदस्त हार हुई. इस युद्ध को हम प्रथम चीन-जापान युद्ध (First Sino-Japanese War) के नाम से भी जानते है. चीन की करारी हार के बाद क्विंग वंश कई भागों में विभाजित हो गया. और यही से विवाद शुरू हो गया.

चीन को रिपब्लिक ऑफ चाइना बनाने के लिए चीन के राष्ट्रवादी नेता सुन यात-सेन ने साल 1912 में एक कॉमिंगतांग पार्टी का गठन किया. इस पार्टी का सपना था कि बिखरे हुए चीन को एक देश बनाना. सुन यात-सेन की पार्टी इस काम में पूरी तरह सफल भी हो गई थी लेकिन साल साल 1925 में सुन यात-सेन की मौत हो गयी. सुन यात-सेन की मौत के बाद कॉमिंगतांग पार्टी दो गुटों में बट गई. राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी और कम्युनिस्टों कॉमिंगतांग पार्टी. और यही से चीन में गृहयुद्ध छिड गया.

राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी के नेता थे चियांग काई शेक इनका कहना था कि जनता को अधिकार देने चाहिए, लोकतंत्र होने चाहिए जनता द्वारा सरकार बननी चाहिए. यह पार्टी उतरवादी निति  और लोकतंत्र पर आधारित थी.

कम्युनिस्टों कॉमिंगतांग पार्टी के नेता माओ त्झ-तोंग का कहना था कि जनता के पास कोई अधिकार नही होने चाहिए, सभी निर्णय सरकार के पास होने चाहिए, जनता को सरकार चुनने का कोई अधिकार नही होना चाहिए. सिर्फ कुछ लोगो के निर्णय के बाद सरकार बनी जाएगी और वही सर्वेसर्वा होगी. यह पार्टी जनता पर अत्याचार और तानाशाह पर आश्रित थी.

साल 1927 में राष्ट्रवादी पार्टी और कम्युनिस्टों पार्टी में युद्ध शुरू हो गया. राष्ट्रवादी पार्टी के लोगो ने शंघाई शहर में रह रहे कम्युनिस्टों पार्टी के लोगो को घर में घुस कर लाखों लोगों को जिंदा काट डाला. इसे हम शंघाई नरसंहार के नाम से भी जानते है. इस युद्ध में कम्युनिस्टों पार्टी की बुरी तरह हार हुई. इस युद्ध ने सिविल वॉर का रूप ले लिया. और यह सिविल वॉर साल 1927 से लेकर 1950 तक चला.

चीन की अलग-अलग पार्टियों की आपसी लड़ाई का फायदा एक बार फिर जापान ने उठा लिया और साल 1931 में जापान ने मंचूरिया पर कब्ज़ा कर लिया. जापान ने मंचूरिया पर अपनी सरकार बनाकर एक ऐसी पार्टी का गठन किया जो जापान के इशारो पर चलती रहे. चीन की हार के बाद जापान का मनोबल बढ़ गया और उसने साल 1937 में तत्कालीन चीन की राजधानी नानजिंग सिटी पर धावा बोल दिया. जापानी सेना ने चीन के नानजिंग सिटी में जो कत्लेआम मचाया उसे नानजिंग नरसंहार के नाम से आज भी दुनिया भूली नही पाई है. जापानी सेना ने दिसंबर 1937 से लेकर 1938 तक महिलाओं के साथ बलात्कार, चोरी, लूटपाट किया और तक़रीबन 3 लाख लोगो को मार डाला जिसमे मरने वाले अधिकतर बच्चे और महिलाएं थे.

द्वितीय चीन-जापान युद्ध (Second Sino-Japanese War) जापान और चीन के बीच साल 1937 से 1945 के बीच तक लड़ा गया. और 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा पर और उसके तीन दिन बाद नागासाकी पर परमाणु बम गिराया जिसमे तक़रीबन 7 लाख से ज्यादा लगो मारे गए. इसके बाद जापान ने घुटने टेक दिए थे. और नानजिंग और ताइवान स्वत: ही चीन के पास चला गया.

द्वितीय चीन-जापान युद्ध 1945 में जापान की हार के बाद भी राष्ट्रवादी पार्टी और कम्युनिस्टों पार्टी में गृहयुद्ध चल रहा था. कम्युनिस्टों पार्टी ने अपनी मदद के लिए रूस से मदद मांगी क्यों कि रूस में भी कम्युनिस्टों पार्टी का दबदबा था. अब चीन में लड़ाई थी मेनलैंड यानी मुख्य भूमि को लेकर. अब कम्युनिस्टों पार्टी की सेना राष्ट्रवादी पार्टी से अधिक हो गई थी. तो इन्होने राष्ट्रवादी पार्टी के लोगो को मारना शुरू किया. चिआंग काई-शेक की पार्टी कम्युनिस्टों पार्टी के आगे कमज़ोर पड़ गई इस पार्टी के लोग या तो मारे गए या भाग गए.

माओ त्से तुंग की कम्युनिस्टों पार्टी ने चीन की 95 फीसदी भूमि पर कब्ज़ा कर लिया था और 1 अक्टूबर 1949 बीजिंग में ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना की. और दूसरी तरह राष्ट्रवादी पार्टी के 20 लाख लोग भागकर फॉर्मोसा द्वीप चले गए जिसे आज हम ताइवान के नाम से जानते है. चिआंग काई-शेक ने दिसंबर 1949 में ताइपे को ताइवान राजधानी घोषित किया और इसका नाम रखा ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’.

तक़रीबन 20 साल तक चीन और ताइवान में कोई बातचीत, संपर्क, बिजनेस और डिप्लोमैटिक रिलेशन नहीं थे. यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने भी ताइवान को असली चीन की मान्यता देकर सरकार को जगह दी. साल 1971 में संयुक्त राष्ट्र ने ताइवान से असली चीन की मान्यता रद्द कर दी और कहा कि तुम देश नही हो तुम चीन के एक पार्ट हो और असली चीन की मान्यता कम्युनिस्ट पार्टी को दे दी गई.

वन चाइना पॉलिसी क्या है?

साल 1949 में पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (PRC) यानि चीन का गठन हुआ. इसमें मेनलैंड चीन और दो विशेष रूप से प्रशासित क्षेत्र मकाऊ-हांगकांग शामिल हैं. वही दूसरी और साल 1911 से लेकर 1949 के बीच रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (ROC)  मेनलैंड चीन पर दबदबा था. लेकिन बाद में इसे ताइवान के रूप में जाना जाने लगा.

वन चाइना पॉलिसी के तहत चीन सिर्फ एक ही राष्ट्र है और ताइवान उसी का हिस्सा और एक प्रांत है. वन चाइना पॉलिसी के अंतर्गत जो भी देश पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (PRC) यानि चीन से कूटनीति संबंध बनाना चाहते है तो उन्हें ताइवान से रोश्ता तोडना होगा. इस समय चीन के 170 से अधिक कूटनीति संबंध वाले देश है जबकि ताइवान के पास सिर्फ 22 देश है. इन 22 देशो को छोड़कर सभी देश ताइवान को चीन का हिस्सा मानते है.

निष्कर्ष– आज के इस लेख में हमने आपको बताया चीन-ताइवान के बीच विवाद (China Taiwan Conflict In Hindi) के बारें में बताया. उम्मीद करते है आपको यह जानकरी जरूर पसंद आई होगी.

FAQ

Q : ताइवान चीन से अलग कब हुआ?
Ans : दिसंबर 1949 में

Q : ताइवान की सेना कितनी है?
Ans : ताइवान के पास तक़रीबन 1 लाख 63 हज़ार एक्टिव फौज है।

Q : चीनी ताइपे कौन सा देश है?
Ans : ताइवान

Q : ताइवान का दूसरा नाम क्या है?
Ans : रिपब्लिक ऑफ चाइना

Q : ताइवान का पहले क्या नाम था?
Ans : फॉर्मोसा द्वीप

 

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मेरा नाम अशोक जांगिड है. मैं जयपुर राजस्थान में रहता हूँ. मुझे कई सालो का ब्लॉग्गिंग का अनुभव है.

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